audio audioduration (s) 7.75 18.6 | transcription stringlengths 58 140 | transcription_normalised stringlengths 58 140 | phonemes stringlengths 91 191 | gender stringclasses 1
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धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || | धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || | dʰɾɪtɾaːʂʈɾə ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm dʰərməkʃeːtɾeː kʊɾʊkʃeːtɾeː səmʋeːtaː jʊjʊtsəʋəh puːrnwɪɾaːm maːmkaːh paːɳɖəʋaːʃcɛːʋ kɪmkʊrʋət sʌɲɟəɛj puːrnwɪɾaːm | Male | |
सञ्जय उवाच । दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। | सञ्जय उवाच । दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm dɾɪʂʈʋaː tʊ paːɳɖəʋaːnikən ʋjuːɖʰən dʊrjoːdʰənʌstədaː puːrnwɪɾaːm aːcaːrjəmʊpəsəŋɡəmjə ɾaːɟaː ʋəcənəməbɾəʋiːt puːrnwɪɾaːm | Male | |
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।। | पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।। | pəʃjɛːtã paːɳɖʊpʊtɾaːɳaːmaːcaːrjə mʌhətĩ cəmuːm puːrnwɪɾaːm ʋjuːɖʰã dɾʊpədpʊtɾeːɳ tʌʋ ʃɪʂjeːɳ dʰiːmtaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: || | अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ: || | ʌtɾə ʃuːɾaː məheːʂʋaːsaː bʰimaːɾɟʊnəsmaː jʊdʰɪ jʊjʊdʰaːnoː ʋɪɾaːʈʌʃc dɾʊpədʌʃc məhaːɾətʰ puːrnwɪɾaːm | Male | |
धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् | पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गव: || | धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् | पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गव: || | dʰɾɪʂʈəkeːtʊʃceːkɪtaːn kaːʃɪɾaːɟʌʃc ʋiːrjəʋaːn puːrnwɪɾaːm pʊɾʊɟɪtkʊntɪbʰoːɟʌʃc ʃɛːbjəʃc nəɾpʊŋɡəʋ puːrnwɪɾaːm | Male | |
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् | सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: || | युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् | सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा: || | jʊdʰaːmnjʊʃc ʋɪkɾaːnt ʊtːmɔːɟaːʃc ʋiːrjəʋaːn puːrnwɪɾaːm sɔːbʰʌdɾoː dɾɔːpdeːjaːʃc sʌrʋ eːʋ məhaːɾtʰaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम | नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते || | अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम | नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते || | ʌsmaːkən tʊ ʋɪʃɪʂʈaː jeː taːnnɪboːdʰ dʋɪɟoːtːəm puːrnwɪɾaːm naːjkaː mʌm sɛːnjəsjə səɲɡjaːɾtʰən taːnbɾəʋiːmɪ teː puːrnwɪɾaːm | Male | |
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || | भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय: | अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च || | bʰəʋaːnbʰiːʂməʃc kərɳʌʃc kɾɪpʌʃc səmɪtɪɲɟəɛj puːrnwɪɾaːm ʌʃʋətʰːaːmaː ʋɪkərɳʌʃc sɔːmədtːɪstətʰɛːʋ cə puːrnwɪɾaːm | Male | |
अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता: | नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा: || | अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता: | नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा: || | ʌnjeː cə bʌhəʋ ʃuːɾaː mədʌɾtʰeː tːjəktəɟiːʋɪtaː puːrnwɪɾaːm naːnaːʃəstɾʌpɾəhəɾɳaː sʌrʋeː jʊdʰːʋɪʃaːɾdaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् | पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् || | अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् | पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् || | ʌprjaːptən tədsmaːkən bʌlən bʰiːʂmaːbʰɪɾkʃɪtəm puːrnwɪɾaːm pərjaːptən tʋɪdmeːteːʂã bʌlən bʰiːmaːbʰɪɾʌkʃɪtəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता: | भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि || | अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता: | भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि || | ʌjneːʂʊ cə sərʋeːʂʊ jətʰaːbʰaːɡəməʋʌstʰɪtaː puːrnwɪɾaːm bʰiːʂməmeːʋaːbʰɪɾəkʃəntʊ bʰəʋʌnt sʌrʋ eːʋ hɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह: | सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् || | तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह: | सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् || | tʌsjə səɲɟənəjənhʌrʂən kʊɾʊʋɾɪdʰː pɪtaːməh puːrnwɪɾaːm sĩhənaːdən ʋɪndjoːcːɛː ʃʌŋkʰən dʌdʰmɔː pɾətaːpʋaːn puːrnwɪɾaːm | Male | |
तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा: | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् || | तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा: | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् || | tʌt ʃəŋkʰaːʃc bʰeːrjəʃc pəɳʋaːnəkɡoːmʊkʰaː puːrnwɪɾaːm səhəsɛːʋaːbʰjəhənjənt sə ʃəbdəstʊmʊloːːbʰəʋət puːrnwɪɾaːm | Male | |
तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ | माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु: || | तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ | माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु: || | tʌt ʃʋeːtɛːrhəjɛːrjʊkteː mʌhətɪ sjʌndəneː stʰɪtɔː puːrnwɪɾaːm maːdʰəʋ paːɳɖəʋʃcɛːʋ dɪʋjɔː ʃʌŋkʰɔː pɾədʌdʰmətʊ puːrnwɪɾaːm | Male | |
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय: | पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदर: || | पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय: | पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदर: || | paːɲcəɟənjən hɾɪʂikeːʃoː deːʋədʌtːən dʰənʌɲɟəɛj puːrnwɪɾaːm pɔːɳɖɾən dʌdʰmɔː məhaːʃʌŋkʰən bʰiːməkʌrmaː ʋɾɪkoːdəɾ puːrnwɪɾaːm | Male | |
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: | नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ || | अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: | नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ || | ʌnʌntəʋɪɟəjən ɾaːɟaː kʊntipʊtɾoː jʊdʰɪʂʈʰɪɾ puːrnwɪɾaːm nʌkʊl səhədeːʋʌʃc sʊɡʰoːʂəmɳɪpʊʂpəkɔː puːrnwɪɾaːm | Male | |
काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ: | धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: || | काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ: | धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित: || | kaːʃjəʃc pəɾmeːʂʋaːs ʃɪkʰʌɳɖi cə məhaːɾətʰ puːrnwɪɾaːm dʰɾɪʂʈədjʊmnoː ʋɪɾaːʈʌʃc saːtːjəkɪʃcaːpɾaːɟɪt puːrnwɪɾaːm | Male | |
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते | सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक् || | द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते | सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक् पृथक् || | dɾʊpdoː dɾɔːpdeːjaːʃc sʌrʋəʃ pɾɪtʰɪʋiːpteː puːrnwɪɾaːm sɔːbʰədɾʌʃc məhaːbaːhʊ ʃəŋkʰaːndədʰmʊ pɾɪtʰək pɾɪtʰək puːrnwɪɾaːm | Male | |
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् | नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् || | स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् | नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् || | sə ɡʰoːʂoː dʰaːɾtəɾaːʂʈɾaːɳã hɾɪdjaːnɪ ʋjədaːɾəjət puːrnwɪɾaːm nəbʰʌʃc pɾɪtʰɪʋĩ cɛːʋ tʊmʊloːːbʰjənʊnaːdəjən puːrnwɪɾaːm | Male | |
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज: | प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव: || | अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज: | प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव: || | ʌtʰ ʋjəʋstʰɪtaːndɾɪʂʈʋaː dʰaːɾtəɾaːʂʈɾaːn kəpɪdʰʋəɟ puːrnwɪɾaːm pɾəʋɾɪtːeː ʃəstɾəsmpaːteː dʰənʊɾʊdjʌmjə paːɳɖəʋ puːrnwɪɾaːm | Male | |
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते | अर्जुन उवाच | सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || | हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते | अर्जुन उवाच | सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || | hɾɪʂikeːʃən tʌdaː ʋaːkːjəmɪdmaːh məhiːpteː puːrnwɪɾaːm ʌɾɟʊn ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm seːnjoːɾʊbʰjoːrmədʰjeː ɾʌtʰən stʰaːpɛj meːːcːjʊt puːrnwɪɾaːm | Male | |
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् | कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे || | यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् | कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे || | jaːʋdeːtaːnnɪɾiːkʃeːːhən joːdʰːʊkaːmaːnəʋstʰɪtaːn puːrnwɪɾaːm kɛːrməjaː sʌh joːdʰːəʋjəmsmɪn ɾəɳəsmʊdjəmeː puːrnwɪɾaːm | Male | |
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागता: | धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षव: || | योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागता: | धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षव: || | joːtsjəmaːnaːnʋeːkʃeːːhən jə eːteːːtɾə səmaːɡtaː puːrnwɪɾaːm dʰaːɾtəɾaːʂʈɾəsjə dʊɾbʊdʰːeːrjʊdʰːeː pɾɪjcɪkiːrʂəʋ puːrnwɪɾaːm | Male | |
सञ्जय उवाच | एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् || | सञ्जय उवाच | एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् || | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm eːʋmʊktoː hɾɪʂikeːʃoː ɡʊɖaːkeːʃeːn bʰaːɾət puːrnwɪɾaːm seːnjoːɾʊbʰjoːrmədʰjeː stʰaːpjɪtʋaː ɾətʰoːtːəməm puːrnwɪɾaːm | Male | |
भीष्मद्रोणप्रमुखत: सर्वेषां च महीक्षिताम् | उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति || | भीष्मद्रोणप्रमुखत: सर्वेषां च महीक्षिताम् | उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति || | bʰiːʂmədɾoːɳəpɾəmʊkʰət sərʋeːʂã cə məhiːkʃɪtaːm puːrnwɪɾaːm ʊʋaːc paːɾtʰ pəʃjɛːtaːnsəmʋeːtaːnkʊɾuːnɪtɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ: पितृ नथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा || | तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ: पितृ नथ पितामहान् | आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा || | tətɾaːpəʃjətstʰɪtaːn paːɾtʰ pɪtɾɪ nʌtʰ pɪtaːmhaːn puːrnwɪɾaːm aːcaːrjaːnmaːtʊlaːnbʰɾaːtɾɪ npʊtɾaːnpɔːtɾaːnsəkʰĩstətʰaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि | तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान् || | श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि | तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान् || | ʃʋəʃʊɾaːnsʊhɾɪdʃcɛːʋ seːnjoːɾʊbʰjoːɾpɪ puːrnwɪɾaːm taːnsəmiːkʃjə sə kɔːnteːj sərʋaːnbəndʰuːnəʋstʰɪtaːn puːrnwɪɾaːm | Male | |
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् || | कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् || | kɾɪpjaː pəɾjaːʋɪʂʈoː ʋɪʂidnnɪdəməbɾəʋiːt puːrnwɪɾaːm ʌɾɟʊn ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm dɾɪʂʈʋeːmən sʋʌɟənən kɾɪʂɳə jʊjʊtsũ səmʊpʌstʰɪtəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति | वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते || | सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति | वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते || | sidʌntɪ mʌm ɡaːtɾaːɳɪ mʊkʰən cə pəɾɪʃʊʂjətɪ puːrnwɪɾaːm ʋeːptʰʊʃc ʃəɾiːɾeː meː ɾoːməhərʂʌʃc ɟaːjteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: || | गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन: || | ɡaːɳɖiʋən sɾʌnsəteː həstaːtːʋəkcɛː ʋə pəɾɪdʌhjəteː puːrnwɪɾaːm nə cə ʃəknoːmjəʋstʰaːtũ bʰɾəmtiːʋ cə meː mʌn puːrnwɪɾaːm | Male | |
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव | न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे || | निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव | न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे || | nɪmɪtːaːnɪ cə pəʃjaːmɪ ʋɪpɾitaːnɪ keːʃəʋ puːrnwɪɾaːm nə cə ʃɾeːjoːːnʊpʃjaːmɪ hʌtʋaː sʋəɟənmaːhəʋeː puːrnwɪɾaːm | Male | |
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च | किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा || | न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च | किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा || | nə kaːŋkʃeː ʋɪɟəjən kɾɪʂɳə nə cə ɾaːɟjən sʊkʰaːnɪ cə puːrnwɪɾaːm kĩ noː ɾaːɟjeːn ɡoːʋɪnd kĩ bʰoːɡɛːɾɟiʋɪteːn ʋaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च | त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च || | येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च | त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च || | jeːʂaːmʌɾtʰeː kaːŋkʃɪtən noː ɾaːɟjən bʰoːɡaː sʊkʰaːnɪ cə puːrnwɪɾaːm tə ɪmeːːʋʌstʰɪtaː jʊdʰːeː pɾaːɳãstːjəktʋaː dʰənaːnɪ cə puːrnwɪɾaːm | Male | |
आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: | मातुला: श्वशुरा: पौत्रा: श्याला: सम्बन्धिनस्तथा || | आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: | मातुला: श्वशुरा: पौत्रा: श्याला: सम्बन्धिनस्तथा || | aːcaːrjaː pɪtəɾ pʊtɾaːstətʰɛːʋ cə pɪtaːmhaː puːrnwɪɾaːm maːtʊlaː ʃʋʌʃʊɾaː pɔːtɾaː ʃjaːlaː səmbəndʰɪnʌstətʰaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते || | एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन | अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते || | eːtaːnnə həntʊmɪcʰcʰaːmɪ ɡʰnətoːːpɪ mədʰʊsuːdən puːrnwɪɾaːm ʌpɪ tɾɛːloːkːjəɾaːɟjəsjə heːtoː kĩ nʊ məhiːkɾɪteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: || | निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: || | nɪhʌtːjə dʰaːɾtəɾaːʂʈɾaːnnə kaː pɾiːtɪ sjaːɟːnaːɾdən puːrnwɪɾaːm paːpmeːʋaːʃɾəjeːdsmaːnhətʋɛːtaːnaːttaːjɪn puːrnwɪɾaːm | Male | |
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् | स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव || | तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् | स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव || | təsmaːnnaːrhaː ʋʌjən hʌntũ dʰaːɾtəɾaːʂʈɾaːnsʋəbaːndʰəʋaːn puːrnwɪɾaːm sʋʌɟənən hɪ kʌtʰən hʌtʋaː sʊkʰɪn sjaːm maːdʰəʋ puːrnwɪɾaːm | Male | |
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: | कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् || | यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: | कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् || | jədjəpːjeːteː nə pəʃjʌntɪ loːbʰoːpəhətceːtəs puːrnwɪɾaːm kʊləkʃəjʌkɾɪtən doːʂən mɪtɾədɾoːheː cə paːtəkəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन || | कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् | कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन || | kʌtʰən nə ɡjeːjəmsmaːbʰɪ paːpaːdsmaːnnɪʋrtɪtʊm puːrnwɪɾaːm kʊləkʃəjʌkɾɪtən doːʂən pɾəpəʃjədbʰɪɾɟənaːɾdən puːrnwɪɾaːm | Male | |
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना: | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || | कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना: | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || | kʊlʌkʃəjeː pɾəɳəʃjʌntɪ kʊlədʰʌrmaː sənaːtnaː puːrnwɪɾaːm dʰʌrmeː nʌʂʈeː kʊlən kɾɪtsnəmədʰrmoːːbʰɪbʰəʋʌtːjʊt puːrnwɪɾaːm | Male | |
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: | स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: || | अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: | स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: || | ʌdʰrmaːbʰɪbʰʋaːtkɾɪʂɳə pɾədʊʂjʌntɪ kʊlʌstɾɪj puːrnwɪɾaːm stɾiːʂʊ dʊʂʈaːsʊ ʋaːrʂɳeːj ɟaːjteː ʋərɳəsʌŋkəɾ puːrnwɪɾaːm | Male | |
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च | पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || | सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च | पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || | sʌŋkəɾoː nəɾkaːjɛːʋ kʊlɡʰnaːnã kʊlʌsjə cə puːrnwɪɾaːm pətʌntɪ pɪtɾoː hjeːʂã lʊptəpɪɳɖoːdəkʌkɾɪjaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: | उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: || | दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: | उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: || | doːʂɛːɾeːtɛː kʊlɡʰnaːnã ʋərɳəsəŋkəɾkaːɾkɛː puːrnwɪɾaːm ʊtsaːdjənteː ɟaːtɪdʰʌrmaː kʊlədʰrmaːʃc ʃaːʃʋətaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन | नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम || | उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन | नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम || | ʊtsənnəkʊlədʰrmaːɳã mənʊʂjaːɳã ɟənaːɾdən puːrnwɪɾaːm nəɾkeːːnɪjətən ʋaːsoː bʰəʋtiːtːjənʊʃʊʃɾʊm puːrnwɪɾaːm | Male | |
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: || | अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् | यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: || | ɛhoː bʌt məhətpaːpən kʌɾtũ ʋjʌʋsɪtaː ʋʌjəm puːrnwɪɾaːm jədɾaːɟjəsʊkʰloːbʰeːn hʌntũ sʋəɟənmʊdjətaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: | धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || | यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: | धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || | jədɪ maːməpɾətikaːɾəməʃʌstɾən ʃəstɾəpaːɳɛj puːrnwɪɾaːm dʰaːɾtəɾaːʂʈɾaː ɾʌɳeː hənjʊstʌnmeː kʃeːmətəɾən bʰəʋeːt puːrnwɪɾaːm | Male | |
सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: || | सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् | विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: || | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm eːʋmʊktʋaːɾɟʊn sʌŋkʰjeː ɾətʰoːpʌstʰ ʊpaːʋɪʃət puːrnwɪɾaːm ʋɪsɾɪɟjə sʌʃəɾən caːpən ʃoːkəsnʋɪɡnəmaːnəs puːrnwɪɾaːm | Male | |
सञ्जय उवाच | तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: || | सञ्जय उवाच | तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: || | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm tʌn tʌtʰaː kɾɪpjaːʋɪʂʈəmʃɾʊpuːrɳaːkʊleːkʃəɳəm puːrnwɪɾaːm ʋɪʂidʌntəmɪdən ʋaːkːjəmʊʋaːc mədʰʊsuːdən puːrnwɪɾaːm | Male | |
श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || | श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || | ʃɾiːbʰəɡʋaːnʊʋaːc puːrnwɪɾaːm kʊtʌstʋaː kʌʃməlmɪdən ʋɪʂmeː səmʊpʌstʰɪtəm puːrnwɪɾaːm ʌnaːrjəɟʊʂʈəməsʋəɾɡjəmkiːɾtɪkəɾəmrɟʊn puːrnwɪɾaːm | Male | |
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || | क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || | klɛːbjən maː smə ɡʌm paːɾtʰ nɛːtətːʋəjjʊpəpʌdjəteː puːrnwɪɾaːm kʃʊdɾən hɾɪdəjdɔːɾbəljən tːjəktʋoːtːɪʂʈʰ pəɾʌntəp puːrnwɪɾaːm | Male | |
अर्जुन उवाच | कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन | इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || | अर्जुन उवाच | कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन | इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || | ʌɾɟʊn ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm kʌtʰən bʰiːʂməməhən sʌŋkʰjeː dɾoːɳən cə mədʰʊsuːdən puːrnwɪɾaːm ɪʂʊbʰɪ pɾətɪjoːtsjaːmɪ puːɟaːrhaːʋɾɪsuːdən puːrnwɪɾaːm | Male | |
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || | गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || | ɡʊɾuːnəhʌtʋaː hɪ məhaːnʊbʰaːʋaːn ʃɾeːjoː bʰoːktũ bʰɛːkʃjəmpih loːkeː puːrnwɪɾaːm hətʋaːɾtʰəkaːmãstʊ ɡʊɾuːnɪhɛːʋ bʰʊɲɟiːj bʰoːɡaːn ɾʊdʰɪɾəpɾədɪɡdʰaːn puːrnwɪɾaːm | Male | |
न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: | यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || | न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: | यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || | nə cɛːtdʋɪdmə kətəɾʌnnoː ɡəɾiːjoː jʌdʋaː ɟəjeːm jədɪ ʋaː noː ɟəjeːjʊ puːrnwɪɾaːm jaːneːʋ hʌtʋaː nə ɟɪɟiʋɪʂaːm steːːʋʌstʰɪtaː pɾʌmʊkʰeː dʰaːɾtəɾaːʂʈɾaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: | यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || | कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: | यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || | kaːɾpəɳjədoːʂoːpəhətəsʋəbʰaːʋ pɾɪcʰcʰaːmɪ tʋã dʰərməsmmuːɖʰceːtaː puːrnwɪɾaːm jəcʰcʰɾeːj sjaːnnɪʃcɪtən bɾuːhɪ tʌnmeː ʃɪʂjəsteːːhən ʃaːdʰɪ mã tʋã pɾəpʌnnəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || | न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || | nə hɪ pɾəpʃjaːmɪ məmaːpnʊdjaːd jəcʰcʰoːkmʊcʰcʰoːʂəɳmɪndɾɪjaːɳaːm puːrnwɪɾaːm ʌʋaːpːjə bʰuːmaːʋəsəpətnəmɾɪdʰːən ɾaːɟjən sʊɾaːɳaːmpɪ caːdʰɪpʌtːjəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप | न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || | सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप | न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || | sʌɲɟəɛj ʊʋaːc puːrnwɪɾaːm eːʋmʊktʋaː hɾɪʂikeːʃən ɡʊɖaːkeːʃ pəɾʌntəp puːrnwɪɾaːm nə joːtsjə ɪtɪ ɡoːʋɪndəmʊktʋaː tuːʂɳĩ bəbʰuːʋ hə puːrnwɪɾaːm | Male | |
तमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच: || | तमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच: || | təmʊʋaːc hɾɪʂikeːʃ pɾəhəsʌnnɪʋ bʰaːɾət puːrnwɪɾaːm seːnjoːɾʊbʰjoːrmədʰjeː ʋɪʂidʌntəmɪdən ʋʌc puːrnwɪɾaːm | Male | |
श्रीभगवानुवाच | अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: || | श्रीभगवानुवाच | अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: || | ʃɾiːbʰəɡʋaːnʊʋaːc puːrnwɪɾaːm ʌʃoːcːjaːnənʋəʃoːcəstʋən pɾəɡjaːʋaːdãʃc bʰaːʂseː puːrnwɪɾaːm ɡətaːsuːnəɡtaːsũʃc naːnʊʃoːcʌntɪ pʌɳɖɪtaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा | न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || | न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा | न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || | nə tʋeːʋaːhən ɟaːtʊ naːsən nə tʋʌn neːmeː ɟənaːdʰɪpaː puːrnwɪɾaːm nə cɛːʋ nə bʰəʋɪʂjaːm sʌrʋeː ʋʌjəmət pʌɾəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || | देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || | deːhɪnoːːsmɪnjətʰaː deːheː kɔːmaːɾən jɔːʋənən ɟʌɾaː puːrnwɪɾaːm tʌtʰaː deːhaːntəɾpɾaːptɪɾdʰiːɾəstətɾə nə mʊhjətɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा: | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || | मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा: | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || | maːtɾaːspərʃaːstʊ kɔːnteːj ʃitoːʂɳəsʊkʰdʊ kʰʌdaː puːrnwɪɾaːm aːɡmaːpaːjɪnoːːnɪtːjaːstãstɪtɪkʃəsʋ bʰaːɾət puːrnwɪɾaːm | Male | |
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || | यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || | jʌn hɪ nə ʋjətʰəjntːjeːteː pʊɾʊʂən pʊɾʊʂʌrʂəbʰ puːrnwɪɾaːm sʌmdʊ kʰʌsʊkʰən dʰiːɾən soːːmɾɪttʋaːj kʌlpəteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: | उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: || | नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: | उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: || | naːstoː ʋɪdjəteː bʰaːʋoː naːbʰaːʋoː ʋɪdjəteː sʌt puːrnwɪɾaːm ʊbʰjoːɾpɪ dɾɪʂʈoːːntəstʋənjoːstətːʋədrʃɪbʰɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् | विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति || | अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् | विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति || | ʌʋɪnaːʃɪ tʊ tədʋɪdʰːɪ jeːn sʌrʋəmɪdən tʌtəm puːrnwɪɾaːm ʋɪnaːʃəməʋjəjsjaːsjə nə kəʃcɪtkəɾtʊmʌrhətɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत || | अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत || | ʌntəʋʌnt ɪmeː deːhaː nɪtːjəsjoːktaː ʃəɾiːɾɪɳ puːrnwɪɾaːm ʌnaːʃɪnoːːpɾəmeːjəsjə təsmaːdjʊdʰjəsʋ bʰaːɾət puːrnwɪɾaːm | Male | |
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || | य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || | jə eːnən ʋeːtːɪ həntaːɾən jəʃcɛːnən mʌnjəteː hʌtəm puːrnwɪɾaːm ʊbʰɔː tɔː nə ʋɪɟaːniːtoː naːjən hʌntɪ nə hʌnjəteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
न जायते म्रियते वा कदाचि नायं भूत्वा भविता वा न भूय: | अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे || | न जायते म्रियते वा कदाचि नायं भूत्वा भविता वा न भूय: | अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे || | nə ɟaːjteː mɾɪjteː ʋaː kədaːcɪ naːjən bʰuːtʋaː bʰʌʋɪtaː ʋaː nə bʰuːj puːrnwɪɾaːm ʌɟoː nɪtːjə ʃaːʃʋətoːːjən pʊɾaːɳoː nə hʌnjəteː hənjəmaːneː ʃəɾiːɾeː puːrnwɪɾaːm | Male | |
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || | वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || | ʋeːdaːʋɪnaːʃɪnən nɪtːjən jə eːnəməɟəmʌʋjəjəm puːrnwɪɾaːm kʌtʰən sə pʊɾʊʂ paːɾtʰ kʌn ɡʰaːtəjtɪ hʌntɪ kʌm puːrnwɪɾaːm | Male | |
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही || | वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही || | ʋaːsãsɪ ɟiːrɳaːnɪ jʌtʰaː ʋɪhaːj nəʋaːnɪ ɡɾɪhɳaːtɪ nəɾoːːpɾaːɳɪ puːrnwɪɾaːm tʌtʰaː ʃəɾiɾaːɳɪ ʋɪhaːj ɟiːrɳaː njənjaːnɪ səɲjaːtɪ nəʋaːnɪ deːhi puːrnwɪɾaːm | Male | |
नैनं दहति पावक: | न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: || | नैनं दहति पावक: | न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: || | nɛːnən dʌhətɪ paːʋək puːrnwɪɾaːm nə cɛːnən kleːdəjntːjaːpoː nə ʃoːʂəjtɪ maːɾʊt puːrnwɪɾaːm | Male | |
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च | नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: || | अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च | नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: || | ʌcʰcʰeːdjoːːjəmdaːhjoːːjəmkleːdjoːːʃoːʂjə eːʋ cə puːrnwɪɾaːm nɪtːjə sʌrʋəɡət stʰaːɳʊɾəcloːːjən sənaːtən puːrnwɪɾaːm | Male | |
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते | तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || | अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते | तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || | ʌʋjəktoːːjəmcɪntːjoːːjəmʋɪkaːrjoːːjmʊcːjəteː puːrnwɪɾaːm təsmaːdeːʋən ʋɪdɪtʋɛːnən naːnʊʃoːcɪtʊmʌrhəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || | अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || | ʌtʰ cɛːnən nɪtːjəɟaːtən nɪtːjən ʋaː mʌnjəseː mɾɪtəm puːrnwɪɾaːm tətʰaːpɪ tʋʌn məhaːbaːhoː nɛːʋən ʃoːcɪtʊmʌrhəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || | जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || | ɟaːtʌsjə hɪ dʰɾʊʋoː mɾɪtːjʊɾdʰɾʊʋən ɟʌnm mɾɪtʌsjə cə puːrnwɪɾaːm təsmaːdəpɾɪhaːrjeːːɾtʰeː nə tʋʌn ʃoːcɪtʊmʌrhəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत | अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || | अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत | अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || | ʌʋjəktaːdiːnɪ bʰuːtaːnɪ ʋjəktəmdʰjaːnɪ bʰaːɾət puːrnwɪɾaːm ʌʋjəktənɪdʰnaːnjeːʋ tʌtɾə kaː pəɾɪdeːʋnaː puːrnwɪɾaːm | Male | |
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: | आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || | आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: | आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || | aːʃcərjəʋətpəʃjətɪ kəʃcɪdeːn maːʃcərjəʋədʋədtɪ tətʰɛːʋ caːnjə puːrnwɪɾaːm aːʃcərjəʋcːɛːnəmənjə ʃɾɪhəlʌntɳoːtɪ ʃɾʊtʋaːpːjeːnən ʋeːd nə cɛːʋ kʌʃcɪt puːrnwɪɾaːm | Male | |
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || | देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || | deːhi nɪtːjəməʋdʰjoːːjən deːheː sərʋʌsjə bʰaːɾət puːrnwɪɾaːm təsmaːtsərʋaːɳɪ bʰuːtaːnɪ nə tʋʌn ʃoːcɪtʊmʌrhəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || | स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || | sʋədʰʌrməmpɪ caːʋeːkʃjə nə ʋɪkmpɪtʊmʌrhəsɪ puːrnwɪɾaːm dʰərmjaːdʰːɪ jʊdʰːaːcʰcʰɾeːjoːːnjətkʃətɾɪjəsjə nə ʋɪdjəteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् | सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || | यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् | सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् || | jədɾɪcʰcʰjaː coːpəpʌnnən sʋəɾɡədʋaːɾəmpaːʋɾɪtəm puːrnwɪɾaːm sʊkʰɪn kʃʌtɾɪjaː paːɾtʰ ləbʰʌnteː jʊdʰːmiːdɾɪʃəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि | तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || | अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि | तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || | ʌtʰ ceːtʌtːʋəmɪmən dʰʌrmjən səŋɡɾaːmən nə kəɾɪʂjəsɪ puːrnwɪɾaːm tʌt sʋədʰʌrmən kiːɾtĩ cə hɪtʋaː paːpəmʋaːpsjəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् | सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || | अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् | सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || | ʌkiːɾtĩ caːpɪ bʰuːtaːnɪ kətʰjɪʂjʌntɪ teːːʋjəjaːm puːrnwɪɾaːm səmbʰaːʋɪtʌsjə caːkiːɾtɪ rməɾɳaːdtɪɾɪcːjəteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: | येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || | भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: | येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || | bʰəjaːdɾəɳaːdʊpəɾətən mənsjʌnteː tʋã məhaːɾtʰaː puːrnwɪɾaːm jeːʂã cə tʋʌn bʌhʊmtoː bʰuːtʋaː jaːsjəsɪ laːɡʰəʋəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: | निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || | अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: | निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || | ʌʋaːcːjəʋaːdãʃc bəhuːnʋədɪʂjəntɪ təʋaːhɪtaː puːrnwɪɾaːm nɪndəntʌstəʋ saːmʌɾtʰjən tʌtoː dʊ kʰʌtəɾən nʊ kɪm puːrnwɪɾaːm | Male | |
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् | तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || | हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् | तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || | hʌtoː ʋaː pɾaːpsjəsɪ sʋʌɾɡən ɟɪtʋaː ʋaː bʰoːkʃjəseː məhiːm puːrnwɪɾaːm təsmaːdʊtːɪʂʈʰ kɔːnteːj jʊdʰːaːj kɾɪtnɪʃcəɛj puːrnwɪɾaːm | Male | |
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ | ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || | सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ | ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || | sʊkʰdʊ kʰeː sʌmeː kɾɪtʋaː laːbʰaːlaːbʰɔː ɟəjaːɟjɔː puːrnwɪɾaːm tʌtoː jʊdʰːaːj jʊɟjʌsʋ nɛːʋən paːpəmʋaːpsjəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु | बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || | एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु | बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || | eːʂaː teːːbʰɪhɪtaː saːŋkʰjeː bʊdʰːɪrjoːɡeː tʋɪmã ʃɾɪɳʊ puːrnwɪɾaːm bʊdʰːjaː jʊktoː jʌjaː paːɾtʰ kərməbʌndʰən pɾəhaːsjəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || | नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || | neːhaːbʰɪkɾəmnaːʃoːːstɪ pɾətːjəʋaːjoː nə ʋɪdjəteː puːrnwɪɾaːm sʋəlpəməpːjʌsjə dʰərmʌsjə tɾaːjteː mʌhətoː bʰəjaːt puːrnwɪɾaːm | Male | |
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || | व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || | ʋjəʋsaːjaːtmɪkaː bʊdʰːɪɾeːkeːh kʊɾʊnʌndən puːrnwɪɾaːm bəhʊʃaːkʰaː hjənntaːʃc bʊdʰːjoːːʋjəʋsaːjɪnaːm puːrnwɪɾaːm | Male | |
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: | वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || | यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: | वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || | jaːmɪmã pʊʂpɪtã ʋaːcən pɾəʋədəntːjəʋɪpʌʃcɪt puːrnwɪɾaːm ʋeːdʋaːdəɾtaː paːɾtʰ naːnjədstitɪ ʋaːdɪn puːrnwɪɾaːm | Male | |
कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || | कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || | kaːmaːtmaːn sʋʌɾɡəpɾaː ɟənməkərməpʰələpɾədaːm puːrnwɪɾaːm kɾɪjaːʋɪʃeːʂəbhʊlã bʰoːɡɛːʃʋərjəɡtĩ pɾʌtɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते || | भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते || | bʰoːɡɛːʃʋərjəpɾəsktaːnã təjaːphɾɪtceːtsaːm puːrnwɪɾaːm ʋjəʋsaːjaːtmɪkaː bʊdʰːɪ səmaːdʰɔː nə ʋɪdʰiːjteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || | त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || | tɾɛːɡʊɳjəʋɪʂjaː ʋeːdaː nɪstɾɛːɡʊɳjoː bʰəʋaːɾɟʊn puːrnwɪɾaːm nɪɾdʋʌndʋoː nɪtːjəsətːʋʌstʰoː nɪrjoːɡkʃeːm aːtməʋaːn puːrnwɪɾaːm | Male | |
यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: || | यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: || | jaːʋaːnʌɾtʰ ʊdpaːneː sʌrʋət səmplʊtoːdkeː puːrnwɪɾaːm taːʋaːnsərʋeːʂʊ ʋeːdeːʂʊ bɾaːhməɳəsjə ʋɪɟaːnət puːrnwɪɾaːm | Male | |
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || | कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || | kərməɳjeːʋaːdʰɪkaːɾʌsteː maː pʰəleːʂʊ kədaːcən puːrnwɪɾaːm maː kərməpʰəlheːtʊɾbʰuːrmaː teː səŋɡoːːstʋəkərməɳɪ puːrnwɪɾaːm | Male | |
योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || | योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || | joːɡʌstʰ kʊɾʊ kərmaːɳɪ sʌŋɡən tːjʌktʋaː dʰənʌɲɟəɛj puːrnwɪɾaːm sɪdʰːjəsɪdʰːjoː sʌmoː bʰuːtʋaː səmʌtʋən joːɡ ʊcːjəteː puːrnwɪɾaːm | Male | |
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय | बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: || | दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय | बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: || | duːɾeːɳ hjʌʋəɾən kʌrm bʊdʰːɪjoːɡaːdʰːənəɲɟəɛj puːrnwɪɾaːm bʊdʰːɔː ʃəɾəɳəmnʋɪcʰcʰ kɾɪpɳaː pʰəlheːtəʋ puːrnwɪɾaːm | Male | |
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् || | बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् || | bʊdʰːɪjʊktoː ɟəhaːtiːh ʊbʰeː sʊkɾɪtdʊʂkɾɪteː puːrnwɪɾaːm təsmaːdjoːɡaːj jʊɟjʌsʋ joːɡ kʌrməsʊ kɔːʃələm puːrnwɪɾaːm | Male | |
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: | जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् || | कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: | जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् || | kʌrməɟən bʊdʰːɪjʊktaː hɪ pʰʌlən tːjʌktʋaː məniːʂɪɳ puːrnwɪɾaːm ɟənməbəndʰəʋɪnɪrmʊktaː pʌdən ɡəcʰcʰəntːjənaːməjəm puːrnwɪɾaːm | Male | |
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || | यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || | jʌdaː teː moːhəklɪlən bʊdʰːɪrʋjətɪtɾɪʂjətɪ puːrnwɪɾaːm tʌdaː ɡəntaːsɪ nɪrʋeːdən ʃɾoːtəʋjʌsjə ʃɾʊtʌsjə cə puːrnwɪɾaːm | Male | |
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || | श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || | ʃɾʊtɪʋɪpɾətɪpʌnnaː teː jʌdaː stʰaːsjətɪ nɪʃcəlaː puːrnwɪɾaːm səmaːdʰaːʋəclaː bʊdʰːɪstədaː joːɡəmʋaːpsjəsɪ puːrnwɪɾaːm | Male |
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